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Thursday, April 18, 2013

UTTARAKHAND FESTIVELS


UTTARAKHAND FESTIVELS


उत्तराखण्ड के उत्सववों का विस्तार में अध्ययन


1-शारदीय उत्सव
 0-मौड मैला
 1-रणभू कीथौग
 2-नौढ़ा कौतिक
 3-लखवाड़ का मेला
 4-सनीगाढ़ का मेला
 5-हरेला कर्क संक्रान्ति
 6-चैती उत्सव
 7-हिलजात्रा
 8-खतड़वा
 9-नुणाई उत्सव
 10-गिर का कौतिक
 11-गिन्दी उत्सव या गेंद का मेला
 12-बौराणी का मेला
 13-बग्वालीपोखर का मेला
 14-बग्वाल
 15-उत्तरकाशी का विषौद का मेला
 16-बग्वालीपाखर का विजयोत्सव
 17-स्याल्दे बिखोती मेला
 19-चैती मेला
 20-उतरैणी मेला
 21-जौलजीवी का मेला
 22-गोचर का मेला


2-देवस्थीलय उत्सव
 1-कमलेश्वर महोत्सव
 2-कालसिन का मेला
 3-कैंचीधाम का मेला
 4-कोट का माई का मेला
 5-गणानाथ उत्सव
 6-चन्द्रवदनी उत्सव
 7-टपकेश्वर उत्सव
 8-देवीधार का मेला
 9-धोलीनागोत्सव
 10-पुण्यागिरी उत्सव
 11-बूंखाल का कालिकोत्सव
 12-गंगादशहरा उत्सव
 13-देवप्रयागी उत्सव

मौण मेला-मछली मारने का यह लोकोत्सव उत्तराखण्ड के पालीपछांऊ तथा जौनसार एवं रर्वाई-जौनपुर के क्षेत्रों में मनाया जाता है। मौण का शाब्दिक अर्थ विष होता है। यह तिमूर अथवा अटाल(एक वनस्पति) की छाल को सुखाने के बाद उसका चूर्ण बनाकर तैयार किया जाता है।इस चूर्ण को खल्टों(बकरी की खाल से बनाये गये थैलों) में भर कर इस अवसर के लिए रख दिया जाता है। और मेले के दिन नदी के मुहाने पर डाल
दिया जाता है। नदी के संकरे मार्ग पर पत्थरों की दीवार बना कर उसके प्रवाह को दूसरी ओर मोड़ दिया जाता है। जिससे मछली वाले गढढों के रूके हुए पानी मे मौण का गहन प्रवाह हो सके। जिससे रूके हुए पानी की मछलीयां अचेतन होकर पानी के उपर आ जाती है और लोग उन्हें बटोरनेमें लग जाते हैं।

मौण का उत्सव तीन रूपों में मनाया जाता था पहला माछीमौण,दूसरा जातरामौण,तीसरा ओदीमौण।
इनमें प्रथम दो का आयोजन अभी भी किया जाता है किन्तु तीसरा ओदीमौण जो सामन्तो व जमींदारों के शक्ति पदर्शन के साथ हुआ करता था अब
अतीत का विषय बन गया है। जातरमौण का आयोजन 12 वर्षों के अन्तराल से हुआ करता है।

कुमाउ में भी इसी प्रकार का उत्सव मनाया जाता है जिसे डहौ उठाना कहते हैं

रणभू कीथौग-इस उत्सव का आयोजन टिहरी जनपद नैलचामी पटटी के अर्न्तगत ढेला गांव में कार्तिक महिने में किया जाता है। यह आयोजन राजशाही के समय विभिन्न युद्वों में मारे गये रणबांकुरों की स्मृति में किया जाता है। इसमें विशेष रूप से रणभूत नृत्यों का आयोजन किया जाता है।

नौढ़ा कौतिक-उत्तराखण्ड के इस लोकोत्सव का आयोजन गढ़वाल मंडल के रूद्रप्रयाग जनपद में कर्णप्रयाग-गैरसेंण मार्ग पर नारायणगंगा के तट पर स्थित आदिबदरी के पवित्र देवस्थल में वैसाख मांस में किया जाता है। इस मेले को लटमार मेला भी कहा जाता है। इस अवसर पर व्यावसायिकक्रय विक्रय भी होता है। इस मेले में भी स्याल्दे के बिखोती के मेले के समान ही पिंडवाली और खेतीवाल लोगों के बीच मंदिर के प्रांगण पर अधिकारकरने के लिए लट्टों का प्रयोग किया जाता है।

लखवाड़ का मेला-इस लोकोत्सव का आयोजन सितम्बर-अक्टूबर में मसूरी से दूर जौनसार बाबर के जनजातिय क्षेत्र चकराता में किया जाता है।

सनीगाढ़ का मेला-इस उत्सव का आयोजन जिला बागेश्वर के कपकोट विकास खण्ड में सनीगाढ़-नवलिंग के देवालय में होता है।

हरेला कर्क संक्रान्ति-कुमांऊ ऋतुउत्सवों में हरियाले का स्थान सबसे उपर है। जिस दिन हरेला बोया जाता है उसी दिन से हरेला का आयोजन हो जाताहै। इस उत्सव में घर की महिलाएं शुद्ध स्थान से मिट्टी खोदकर लाती हैं तथा उसे सुखा कर छाान लेती हैं। तथा फिर पंच या सप्त धान्यों जैसे धान,मकई,उड़द,गहत, तिल,भट्ट आदि को मिश्रीत करके इसमें बो देती हैं। इस उत्सव में इसे बोने का कार्य महिलाओं तथा सिंचीत करने का कार्य कुवारी कन्याओं का होता है। इस त्यौहार पर विशेष तौर पर वृक्षारोपण के तौर पर बनाया जाता है।

चैती उत्सव-यह बोक्सा समाज का कृषि से जुडा हुआ प्रमुख लोकोत्सव है। जो वर्ष के प्रारम्भ में अर्थात चैत्रमास में मनाया जाता है।इस उत्सव में नये कृषि उत्पादों का उपभोग वर्जीत होता है। जब तक कि सम्बद्व देवी देवताओं को विशेषकर काशीपुर वाली देवी को न चढ़ा दिया जाए।

हिलजात्रा-यह भी कुमाउं मंडल के पिथौरागढ़ जनपद को सोर घाटी में मनाया जाता है। यह वर्षाकाल में प्रारम्भ में कृषक वर्ग द्वारा अभिनीत किया जानेवाला विशुद्व लोक नाट्य है। कृषि से सम्बद्व होने के कारण ही इसमें अभिनय करने वाले पात्रो का रूप भी तदअनुरूप ही होता है।

खतड़वा-खतड़वा का उत्सव केवल कुमाउ में वर्षाकाल की समाप्ति व शरद ऋतु के आगमन मंे कन्या संक्रान्ति को मनाया जाता है। यह कुमाउं के पशुचारक वर्गीय समाज का एक विशेष लोकोत्सव है।

नुणाई उत्सव-पशुचारकों से सम्बद्व यह पशूत्सव देहरादून जनपद के जनजातीय क्षेत्र जौनसार-बाबर के खत पटटी के भटाड़ गांव में मनाया जाता है।इसमें जंगलो में निवास करने वाले बकरवाल व मेषपालक अवश्य ही अपने पशुओ के रेवड़ों को लेकर घर आते हैं। तथा अपने पशुओं के रक्षक देवता सिलगुरू जी को अर्पित कर फिर भेड़-बकरियों के नाम पर शिरवा चढ़ाते हैं।


गिर का कौतिक-इस मनोरंजन लोकोत्सव अल्मोड़ा जनपद के मासी क्षेत्र में तुनाचौर के मैदान में तथा तल्ला सल्ट में चनुली गांव के निकटस्थ मैदान
में मकरसंक्रान्ति के दिन किया जाता है। इस क्रीडा में भाग लेने वाले खिलाड़ी तथा दर्शक नियत मैदान में आकर एकत्र होते हैं।

गिन्दी उत्सव या गेंद का मेला-मकर संक्रान्ति के अवसर पर दक्षिणी गढ़वाल के यमकेश्वर विकास में थल के निकटस्थ मैदान में लगने वाला यह प्रसिद्ध मैला
है।

बौराणी का मेला-द्यूतक्रीडा से जुडा यह उत्सव कुमाऊं मण्डल के पिथौरागढ़ जनपद में दिपावली के ठीक 15 दिन बाद बौराणी नामक स्थान पर तत्रस्थ
समदेवता के मंदिर के प्रागण में मनाया जाता है।

बग्वालीपोखर का मेला-अन्य द्यूतोत्सवों में जुआ हारने वाले जुआरियों के लिए यह उच्चतम न्यायालय के रूप में प्रसिद्व है। यह मेला जिला अल्मोड़ा की रानीखेत
तहसील के अर्न्तगत खैरना-कर्णप्रयाग मार्ग पर मछखाली एवं द्वाराहाट के मध्य में स्थित बग्वालीपोखर में लगता है।

बग्वाल-पर्वतीय क्षेत्रों में दीपावली का उत्सव मनाने के बाद अगले दिन से तीन दिन तक एक युद्ध की तैयारी के रूप में समरोत्सव(बग्वाल) मनाया जाता है।
जिसमें पाषाणी युद्धकला में प्रवीण योद्धा अपने कौशल का प्रदर्शन करते हैं। नैनीताल तथा चम्पावत के सीमान्त क्षेत्र, देवीधूरा में मनाये जाने वाला असाड़ी
का उत्सव कुमाऊं का प्रसिद्ध बग्वाल उत्सव है।

उत्तरकाशी का विषौद का मेला- उत्तरकाशी के भटवाड़ी तथा क्यार्क में विशाल  मेले का आयोजन होता है। यह मेला अपने धनुषबाणों के युद्ध के
लिए प्रसिद्ध है।

बग्वालीपाखर का विजयोत्सव-कार्तिक मास में दीपावली के बाद यमद्धितीया को आयोजित किये जाने वाले बग्वाली पोखर के द्यूप क्रीडोत्सव का एक
अन्य ऐतिहासिक पक्ष था भंडर गांव के थोकदार का अपने योद्धाओं के साथ ‘ओढ़’ भेंटना, जो कि इस मेले का प्रमुख आर्कषण हुआ करता था।इसमें
निकटस्थ भंडर गांव का थोकदार घोड़े पर सवार होकर नगाड़ों की डंके की चोटों के साथ जूलूस के रूप में आगे-आगे अपने वीरों का नेतृत्व करता था
लाल रंग का ध्वज,उसके बाद होती थीं एक क्विंटल भार के विशाल नगाडों की आजपूर्ण तालबद्ध गगनभेदी ध्वनियां, साथ ही होते थे इन सबके पीछे
होता था एक शान्ति एवं विजयश्री का प्रतीक श्वेत ध्वज

स्याल्दे बिखोती मेला-बग्वाल पोखर के समान ही यहां भी ‘ओढ़ा भेंटने’ की परम्परा प्रचलित रही है। यह मेला द्धाराहाट नगर में होता है।

चैती मेला-मेरठ के प्रसिद्ध नौचन्दी के मेले के समान ही यह मेला काशीपुर में लगता है। इसमे किसी बड़े मेले के समान ही कौतुकीय व्यवस्थाओं
-सर्कस,झूले,बाजार की जनउपयोगी वस्तुओं का बड़े व्यापारिक स्तर पर क्रय विक्रय होता है।

उतरैणी मेला-मकरसंक्रान्ति के अवसर पर कुमांऊ के अल्मोड़ा जनपद में एक सप्तदिवसीय प्रसिद्ध लोकोत्सव का आयोजन हुआ करता था।जिसमें कुमाउ
के अतिरिक्त गढ़वाल से नेपाल तक के लोग काफी संख्या में सम्मिलत होते थे।

जौलजीवी का मेला-इस मेले का आयोजन पिथौरागढ़ जनपद में उसके मुख्यालय से 70 किमी की दूरी पर धारचूला विकास खण्ड में अस्कोट से 10 किमी
दूर गारी काली नदियों के संगम पर दो दिनी उत्सव मनाया जाता है।

थल का मेला-यह एक व्यावसायिक मेला है। जो प्रतिवर्ष जिला पिथौरागड़ के थल में लगता है।

गोचर का मेला-यह एक औद्योगिक एवं व्यासायिक मेला है। जिसका शुभारम्भ पं. जवाहरलालनेहरू के जन्मदिन अर्थात 14 नवम्बर को होता है।
जिसमें विशेषकर उत्तराखंड के कुटीर उद्योग से समबन्धित वस्तुओं का प्रदर्शन एवं क्रय विक्रय होता है।


कमलेश्वर महोत्सव-इस धार्मिक लोकोत्सव का आयोजन कार्तिक मास के शुक्लपक्ष को चतुदर्शी , जिसे ‘बैकुण्ठ चतुदर्शी’ भी कहा जाता है, को गढ़वालकी पिछली राजधानी श्रीनगर में अलकनंदा के तट पर सिथत कमलेश्वर महादेव के प्रसिद्ध देवालय में किया जाता है।

कालसिन का मेला-यह मेला कुमाउं जनपद के अन्तर्गत जनपद चम्पाव में टनकपुर-चम्पाव राजमार्ग पर 25 किमी पर स्थित सूखीढांग से 5 किमी आगे श्वामताल के क्षेत्र में आयोजित किया जाता है।

कैंचीधाम का मेला-यह एकदिवसीय भण्डारोत्सव का आयोजन कुमाऊं मंडल के नैनीताल जनपद में उसके मुख्यालय से 18 किमी पूर्व में हल्द्धानी-रानीखेत अल्मोड़ा राजमार्ग पर कैंचीधाम नामक स्थान पर नीकरौरी के आश्रम में स्थापना दिवस के रूप में भण्डारे का आयोजन किया जाता है।

कोट का माई का मेला-यह मेला मार्कण्डेयपुराण में उल्लीखीत भ्रामरीदेवी तथा नन्दादेवी के सम्मान में चैच मास नवरात्रों की पंचमी से लेकर अष्टमी तक बैजनाथ?से लेकर ग्वालदम वाले मार्ग पर एक उॅची चोटी पर मनाया जाता है। पहले कत्यूरी शासन में इस स्थान को ‘रणचूलाकोट’ कहा जाता था।

गणानाथ उत्सव-यह उत्सव कुछ समय पूर्व तक अल्मोड़ा जनपदस्थ गणानाथ का उत्सव भी काफी प्रसिद्ध था ।

चन्द्रवदनी उत्सव-यह देवोत्सव गढ़वाल मंडल में टिहरी जनपद के 47 किमी पूर्व में तथा देवप्रयाग से 36 किमी आगे समुद्रतल से लगभग 2253 मी की उचाई पर स्थित गढ़वाल के 4 शक्तिपीठों में अत्यधिक प्रसिद्ध चन्द्रवदनी मंदिर में प्रतिवर्ष बैसाख में मनाया जाता है।

टपकेश्वर उत्सव-यह उत्सव देहरादून के निकट टौंस की सहायक नदी देवधारा के तट पर स्थित टपकेश्वर महोदय के मंदिर में शिवरात्रि को आयोजितहोता है। इस उत्सव का इस क्षेत्र के उत्सवों में काफी महत्वपूर्ण स्थान है।

देवीधार का मेला-यह लोकोत्सव चम्पावत जनपद के लोहाधाट से लगभग तीन किमी. पूर्व एक पहाड़ी की तलहटी में स्थित शिवालय में बनाया जाता है।

धोलीनागोत्सव-धौलीनाग का प्रसिद्ध मंदिर कुमाउं मंडल के बागेश्वर जनपद में बागेश्वर थल मार्ग पर आगे स्थित है। मूलतः यह पिथौरागढ़ में आता है।

ABOUT UTTARAKHAND DISTRICTS


ABOUT UTTARAKHAND DISTRICTS



                                                         हरिद्वार


हरिद्वार गड़वाल क्षेत्र का अति विशिष्ट नगर र्है, जो कि शिवालिक श्रेणी नील व विल्व
पर्वतों के मध्य गंगाा के दहिने तट पर स्थित है। हरिद्वार का गठन जिले के रूप में 28श्
दिसम्बर 1988 को किया गया था। पहले यह साहरनपुर जनपद में था पर गठन के
बाद इसे गडवाल मण्डल का एक जिला बना दिया गया है।

पुराणों में इसे गंगद्वार, देवताओं का द्वार, स्वर्ग द्वार, मायापुरी, चार धामों का द्वार, स्वर्ग
द्वार , मायापुरी व मायाक्षेत्र कहा जाता था।

हरिद्वार के प्रमुख धार्मिक स्थल
हरिद्धार का हर की पौढ़ी की शाम का दृश्य
1-गउधाट
2-कुशावर्त घाट
3-मायादेवी मन्दिर
4-चण्डीदेवी मन्दिर(पौढ़ी में)
5- बिल्वकेश्वर मन्दिर
6-भीमगोढ़ा कंुड
7-सप्तश्रृषि आश्रम
8-शान्तिकुंज
9-कनखल
10-रूड़की

हरिद्वार के प्रमुख सस्थान
1-सन्ट्रल बिल्डिंग रिसर्च इंस्टीयूट, रूड़की
2-स्ट्रक्चरल इंजीनियरींग रिसर्च सेन्टर, रूड़की
3-इण्डस्ट्रियल टैक्सोलाजिकल रिसर्च सेन्टर, रूड़की

                                                                   देहरादून
देहरादून नगर बाहा एवं मध्य हिमालय के बीच स्थित दून घाटी में बसा र्है। इसका
आकार दोने(द्रोण) जैसा है। 1817 में इसे जिला बनाकर मेरठ मण्डल में रखा गया।1957 से यह
गडवाल मण्डल में है

देहरादून जिले प्रमुख दर्शनीय स्थल
1-गुच्चूपानी
2-श्री गुरू रामराय दरबार साहिब
3-टपकेश्वर महादेव
4- लक्ष्मण सिद्व
5-चन्द्रबनी
6-भागीरथी रिर्सोट्स
7-फन वैली
8-मालसी डियर पार्क
9-राजाजी राष्ट्रीय पार्क
10-सहस्त्रधारा
11-जौनसार बावर
  1.कालसी
  2.लाखामण्डल
  3.बैराटगड़
  4.हनोल
  5.पर्वतों की रानी मसूरी
मसूरी के कुछ प्रमुख स्थान
1-भद्राज मन्दिर
2-ज्वालाजी मन्दिर
3-सुरकंडा देवी
4-मसूरी झील
5-कैप्पटी फॉल
6-श्रृषिकेष
श्रृषिकेष के कुछ प्रमुख स्थान
1-तपोवन
2-लक्ष्मण झूला
3-त्रिवेणी घाट
4-नीलकंठ महादेव
5-भरत मंदिर
6-कैलाश निकेतन मंदिर
7-शिवानंद झूला
8-शत्रुधन मंदिर
9-शिवानंद आश्रम
10-मुनि की रेती

                                                             उत्तरकाशी

देवभूमि के नाम से विख्यात यह नगर भागीरथी नदी के दाईं ओर स्थित है। उत्तरकाशी का प्राचीन नाम बाडाहाट है

उत्तरकाशी के प्रमुख दर्शनीय स्थल निन्नलिखीत हैं
1-गंगात्री-यहां भागीरथी का एक मन्दिर स्थापित है
जिसमें गंगा, लक्ष्मी, पार्वती व अन्नापूर्णादेवी की
 मूर्तियां स्थापित हैं कहा जाती है कि यहां राजा भागीरथ
ने स्वर्ग से गंगा को पृथ्वी पर लाने के कठोर तपस्या
 की थी व स्वर्ग से पृथ्वी पर उतरती गंगा को इसी
स्थान पर भगवान शिव ने अपनी जटाओं में बांधा
था। इस मन्दिर को निर्माण 18 शताब्दि में गोरखा
सेनापति अमरसिंह थापा ने कराया तथा पुनरूदार
जयपुर के राजा माधो सिंह ने कराया था। इस मन्दिर
के कपाट प्रतिवर्ष अप्रैल में अक्षय तृतीया को खुलते हैं।
यहां के अन्य निकटतम दर्शनीय स्थलों में सूर्य कूण्ड , गौरीकुण्ड, पंतगाना, भैरव झाप स्थित हैं।

2-यमुनात्री-यमुना के बांए तट पर स्थित यमुनोत्री मंदिर का निर्माण 1919 में गढ़वाल नरेश प्रतापशाह ने तथा पुननिर्माण जयपुर की महारानी ने करायी थी।
3-विश्वनाथ मन्दिर
4-गंगानी अर्थात गरमपानी यहां गंघक युक्ज जल का स्त्रोत है
5-हनुमान चटटी-यहां से डोडी ताल का ट्रैकिंग का मार्ग शुरू होता है
6-महासू मन्दिर-उत्तरकाशी से कुछ दूरी पर स्थित हनोल में महासू(महाशिव) देवता का प्रसिद्ध मन्दिर है
7-बाड़ाहाट-यहां एक प्राचीन शक्तिपीठ है जहॉं एक त्रिशूल गढ़ा है
8-नचिकेता ताल
9-दयारा बुग्याल-यह अत्यन्त मनोहारी, रमणीक, व पर्यटन से महत्वपूर्ण स्थान है
10-हरकीदून

                                                                    चमाली

चमोली जनपद का मुख्यालय गोपेश्रवर में है। 1960 में गढ़वाल जनपद से अलग करके चमोली को नया जनपद बनाया गया। यहां पर 7वीं-8वीं सदी का एक विशाल शिव मन्दिर है।इस जिले के प्रमुख दर्शनीय स्थल इस प्रकार हैं

पंचबदरी- पांचो बदरी(विष्णु भगवान) चमोली जिले में ही स्थित हैं।
1-बद्रीनाथ
2-आदिबदरी
3-भविष्यबदरी
4-वृद्व बदरी
5-योगध्यान बदरी




पंचकेदार-पंच केदारों में तुंगनाथ,रूद्रनाथ,मदमहेश्वर,कल्पेश्वर, एवं केदारनाथ हैं।वर्तमान में चमोली जनपद में रूद्रनाथएवं कल्पेश्वर महादेव मन्दिर स्थित है। शेष तीन रूद्र्रप्रयाग जिले में हैं
पंचप्रयाग-पवित्र नदियों के संगम पर स्थित प्रयागों का धार्मिक दृष्टि से विशेष महत्व है। गढ़वाल में अलकनन्दा एवं विभिन्न नदियों के संगम पर स्थित पंच प्रयाग विशेष महत्व के हैं। ये निम्न हैं-

1-विष्णुप्रयाग
2-नन्दप्रयाग
3-कर्णप्रयाग
4-रूद्रप्रयाग
5-देवप्रयाग

वसुंधरा प्रपात-चमोली के अंतिम गांव माणा कुछ दूरी पर ग्लेशियरों व उॅची चटटानों पर स्थित है।

गैरसेंण-चमोली जिले में गैरसेंण उत्तराखंड के राज्य निर्माण की मांग से ही महत्वपूर्ण माना जाता रहा है
गैरसेंण को रमाशंकर कौशिक समिती ने उत्तराखंड की भावी राजधानी हेतु उपयुक्त स्थान माना गया है।
यह स्थान चाय बागानों के लिए प्रसिद्व है।

ग्वालदम-बागेश्वर सीमा पर स्थित चमोली का यह स्थल प्राकृतिक सुषमा के लिए प्रसिद्व है।
यहां से नन्दाघुंुटी,नन्दादेवी, व त्रिशूल हिमशिखरों का मनोरम दृश्य दिखाई देता है।

ग्वालदम सेब एवं चाय उत्पादन के लिए भी प्रसिद्व है।

जोशीमठ-जोशीमठ नाम संस्कृत शब्द ज्योर्तिमय का विकृत रूप है। जिसका अर्थ है शिव के ज्योर्तिलिंग का स्थल।
प्राचीन काल में इसे येषि कहा जाता था। इस मठ की स्थापना आदि गुरू शंकराचार्य ने की। हिंदुओ में यह विश्वास है?
कि शरद् श्रृतु में भगवान बद्रीनाथ(विष्णु) यहां स्वयं विश्राम करते हैं।
जोशीमठ में ही शंकराचार्य ने पूर्णागिरी देवी पीठ की स्थापना की।

हेमकुंड साहिब-यह सात भव्य बर्फ से ढके पहाड़ों से धिरा हुआ है, जिनको हेमकुण्ड
पर्वत कहा जाता है।हाथी पर्वत एवं सप्तश्रिंग पर्वत शिखरों के हिमनद झील को जल
पाषित करते हैं।झील से हिमगंगा नामक छोटी नदी निकलती र्है।झील के किनारे एक
लक्ष्मण मन्दिर भी है।

रूपकुण्ड-यह स्थल चमोली जनपद के विकासखण्ड देवाल से 25 किमी दूर त्रिशूल पर्वत
की तलहटी पर स्थित है। यहाँ पर ढाई किमी. व्यास की परिधी में नरकंकाल फैले हुए हैं।

चांदपुर गढ़ी- गढ़वाल के 52 गढ़ों में अभी तक केवल यही एक गढ बचा है इसे 9वीं शदी
का माना जाता है।

फूलों की धाटी-श्रृषिकेश-बद्रीनाथ मार्ग मार्ग पर स्थित फूलों की घाटी को वर्ष 2005 में विश्व
धरोहर में शामिल कर लिया गया है।

औली-जोशीमठ से सड़क मार्ग से 1.2 किमी की दूरी पर रोपवे (1993 से शुरू) 4किमी की दूरी पर स्थित
गर्मी की छुटयों बिताने के लिए मनोरंजक स्थान है।


नन्दादेवी-नन्दादेवी जोशीमठ-मलारी मार्ग पर लगभग 21 किमी दरी पर स्थित है। यहां
नन्दादेवी का सिद्वपीठ मन्दिर है।
भारत सरकार ने नन्दादेवी जैव मण्डल रिजर्व को राष्ट्रीय पार्क के रूप में स्थापना 1982 में की थी
1988 में इसे संयुक्त राष्ट्र विरासत दिवस के रूप में पंजीकृत किया गया।

त्रिशूल पर्वत-रानीखेत,अल्मोड़ा तथा ग्वालदम से यह नुकीला दिखाई देता है।

माणा- चमोली के सीमा पर स्थित गांव भारत की सीमा पर अन्तिम बसा गांव है। यहां
पर अलकनंदा व सरस्वती नदी का संगम होता है। इसे केशव प्रयाग कहा जाता है।
यहां के दर्शनीय स्थलों में गणेश गुफा,व्यास गुफा, भीम पुल मुख्य हैं।

                                                      रूद्रप्रयाग

रूद्रप्रयाग बद्रीनाथ-केदारनाथ यात्रा का मुख्य पड़ाव एवं पंच प्रयागों में एक है। यहां अलकनंदा
व मंदाकिनी नदियों का संगम है।
18 सितम्बर,1977 को टिहरी,पौड़ी, चमोली जिलों को मिलाकर इसे जिला बनाया गया था।

इस जिले के प्रमुख दर्शनीय स्थल इस प्रकार हैं

1-केदारनाथ-
2-मदमहेश्वरनाथ-
3-ऊखी मठ
4-सोनप्रयाग
5-गौरीकुंड
6-अगस्तमुनि
7-गुप्तकाशी
8-कोटेश्वर महादेव
9-बाणसुर मन्दिर
10-कालीमठ सिद्वपीठ

1-केदारनाथ-रूद्र प्रयाग में स्थित केदारनाथ द्वादश ज्योर्तिर्लिगों में से एक है।
यह मन्दिर खर्चाखंड और भरतखंड शिखरों के पास केदार शिखर पर स्थित है।
जिसके वाम पर पुरंदर पर्वत है। यह मंदिर कत्यूरी निर्माण शैली का है।

तुंगनाथ उत्तराखण्ड में सर्वाधिक ऊॅचाई पर स्थित देवमन्दिर है।

5-गौरीकुंड-गौरीकुंड केदारनाथ मार्ग का अन्तिम बस स्टेशन है। यहां यात्री
गर्म जल के कुण्ड से स्नान करते है।

6-अगस्तमुनि-यह मन्दाकिनी नदी के तट पर स्थित है। जहां अगस्त श्रृषि ने वर्षों तक तप किया था।

9-बाणसुर मन्दिर(लमगौड़ी-बामसू)-गुप्तकाशी-बसु केदार मार्ग पर प्राचीन बाणासुर मन्दिर राजकीय
इंटर कालेज लमगौड़ी से मिला है। प्राचीन मान्यता के अनुसार यह मन्दिर असुर राजा बाणासुर के द्वारा
ही बनायी गयी थी।

                                                                  टिहरी गडवाल


भागीरथी व भिलंगना नदियों के संगम पर स्थित टिहरी नगर, जो कि अब टिहरी डैम से विलिन हो चुका है,

की स्थापना 1815 में गढ़वाल नरेश सुदर्शन शाह ने टिहरी राज्य की राजधानी के रूप मे की थी।

देश की स्वतंत्रता के बाद 1 अगस्त, 1949 को टिहरी गढ़वाल एक पृथक् जनपद के रूप में गठित हुआ।

टिहरी बांध के निर्माण स्वरूप एक नया नगर श्रृषिकेष से 60 किमी दूर बसाया गया व पुर्नवास किया गया।

टिहरी के प्रमुख स्थल इस प्रकार हैं


1-देवप्रयाग
2-चन्द्रबदनी
3-चम्बा
4-कैम्पटी जलप्रपात
5-सुरकंडा देवी
6-बूढ़ा केदार
7-नागटिब्बा
8-विश्वनाथ गुफा


देवप्रयाग-देवप्रयाग भागीरथी(सास) और अलकनन्दा(बहु) नदियों के संगम पर तथा श्रृषिकेश-बद्रीनाथ मार्ग पर
स्थित है। इस नगर के निकट दो झूला पुल है जो क्रमशः भागीरथी तथा एक अलकनन्दा पर हैं यहां पर 2
कुण्ड हैं जिन्हें क्रमशः बहमकुण्ड और वशिष्ट कुण्ड कहते हैं। पंचप्रयागों में सर्वाधिक धार्मिक महत्व का है।

चन्द्रबदनी-टिहरी से श्रीनगर मोटर मार्ग पर स्थित एक मन्दिर है। तीर्थ स्थली मां चन्द्रबदनी मन्दिर चन्द्रकूट
पर्वत पर स्थित है। यहां पर प्राकृतिक श्रीयन्त्र स्थापित है।

चम्बा-यह अत्यन्त मनोरम दृश्यों वाला पवित्र भागीरथी घाटी पर स्थित है।
धनाल्टी
कैम्पटी जलप्रपात-मसूरी-यमुनोत्री मार्ग पर मसूरी से 15 किमी दूर टिहरी जिले में स्थित विशालतम एवं मनोहरतम
जल प्रपात होने की विशिष्टता रखता है।
बूढ़ा केदार-यह स्थल भगवान केदानाथ का प्राचीन एवं भव्य मन्दिर है।
विश्वनाथ गुफा-केदानाथ मार्ग पर विश्वनाथ पर्वत पर यह गुफा है। यह आदि शंकराचार्य की तपस्थली है।






                                                                   पौढ़ी गढवाल

1815 से 1840 तक ब्रिटीश गढ़वाल की राजधानी श्रीनगर रही। 1840 में राजधानी श्रीनगर से पौढ़ी में स्थानान्तरित
की गई और पौढ़ी को ब्रिटीश गढ़वाल का एक जिला बनाया गया। स्वतंत्रता के बाद इसे गढ़वाल मण्डल का मुख्यालय
बनाया गया।1992 में इसे हिल स्टेशन बनाया गया।
1960 में इससे काटकर चमोली जिले की तथा 1997 में रूद्रप्रयाग जिले की स्थापना की गई।
पौढ़ी से हिमाच्छाादित हिमालय का अर्द्धवृत्ताकार रूप में जो व्यापक दृश्य दिखाई देता है, यह भारत के किसी भी
भाग से दिखाई नहीं देता।
इसके समीप क दर्शनीय स्थलों में क्यूंकालेश्वर,नागदेव,खिर्सू, ज्वालधाम, आदि उल्लेखनीय है।
रांसी में एक स्टेडियम का निर्माण किया गया है जो एशिया में दूसरा सबसे ऊँचाई पर स्थित स्टेडियम है।
24 दिसम्बर. 2001 से पौड़ी को देवप्रयाग से पुल से जोड़ दिया गया है।

इस जिले के प्रमुख दर्शनीय स्थल इस प्रकार हैं।



1-श्रीनगर
     धार देवी मंदिर
     सोम का भांडा
     केशोराय मठ
     शंकर मठ
     कमलेश्वर मंदिर

2-कोटद्धार
     कण्वाश्रम
     कालीमठ(काली तीर्थ)
     कालागढ़
     सिद्धबली मंदिर
     दुगड्डा

3-बिनसार महादेव
4-नीलकंठ महादेव
5-खिरसू
6-ज्वाला देवी
7-लैंसडाउन
8-तारकेश्वर मंदिर
देवलगढ़ मंदिर
देवलगढ़
कोट महादेव

श्रीनगर-श्रीनगर की स्थापना 1358 में गढ़वाल नरेश महिपतिशाह ने की थी। लेकिन राज्य की राजधानी यहां पर 1515 में
अजयपाल द्वारा स्थापित की गई।1804 से 1815 तक इस गोरखाओं का तथा 1815 से इस पर अंग्रेजो का अधिकार रहा।
स्वतंत्रता के बाद इसे पौढ़ी जिले का अंग बनाया ।
1973 में यहां गढ़वाल विश्वविधालय की स्थापना की गई।
श्रीनगर के प्रमुख स्थल इस प्रकार हैं
     धार देवी मंदिर
     सोम का भांडा
     केशोराय मठ
     शंकर मठ
     कमलेश्वर मंदिर

कोटद्वार-यह गढ़वाल का प्रवेश द्वार है। जो कि समतल भूमि पर बसा है। यहां पौढ़ी गढ़वाल जिले का एकमात्र रेलवे स्टेशन है
यहां के प्रमुख दर्शनीय स्थल इस प्रकार हैं
कण्वाश्रम-मालिनी नदी के तट पर कण्वाश्रम स्थित है। यहीं पर कालीदास ने अभिज्ञान शाकुन्तलम लिखी की रचना की थी।
कालीमठ-यह मंदिर सिद्वपीठ के रूप में जाना जाता है। शारदीय नवरात्र में यहां बहुत भीड़ रहती है।
कालागड़-यहां रामगंगा नदी पर निर्मित बांध दर्शनीय है।

बिनसर महादेव-यह मंदिर राजा कल्याण चन्द्र द्वारा बनवाया गया था। कार्तिक पूर्णिमा को यहां बड़ा मेंला लगता है। जिसमें कुमाऊ व गढ़वाल के
लोग सम्लित होते हैं।

नीलकंठ महादेव-यह मंदिर शिव जी का मंदिर है यहां पर शंभु-निशंभु नामक दो दर्शनीय पर्वत हैं।

खिरसू- पौढ़ी से 19 किमी दूर स्थित खिरसू प्रदूषण मुक्त एक शान्त पर्यटन स्थल है।

लैंसडाउन-भारतीय सेना के विख्यात गढ़वाल राइफल्स का कमांड आफिस यहीं पर स्थित है।
यहां पर प्रसिद्व कालेश्वर महादेव का मंदिर है। जिस कारण इस नगर को कालेश्वर भी कहा जाता है।

कोट महादेव-कोट महादेव का मंदिर पटटी सितोनस्यूं में स्थित है। यह स्थल महर्षि बाल्मीकि की तपस्थली रही है।
माना जाता है कि सीता यहां के फलस्वाड़ी गांव के मैदान में कार्तिकशुक्ल पक्ष द्वादशी के दिन धरती की गोद में समाई
थी।



                                                               नैनीताल

सरोवरी नगरी या झीलों की नगरी के नाम से प्रसिद्व यह नगर टिफिन टॉप, चायनापीक,लड़िया कांटा, स्नोव्यू,शेर का डांडा आदि उॅची उॅची पहाड़ीयों से धिरा हुआ है। यह नगर विदेशी पर्यटकों व सैलानियों के लिए मनोरम स्थान है। विश्व में सर्वाधिक झालों वाले पर्यटन स्थानों की श्रेणी में नैनीताल का स्थान है यह नगर 7 पहाड़ियों क्रमशः आयर पात, हाड़ीगडी, देवपात, चानापीक, स्नाव्यू, आलमसरिया, कांटा, शेर का डांडा से धिरा
हुआ है।नैनीताल के सम्बन्ध में कुछ महत्वपूर्ण तथ्य इस प्रकार हैं-

1-1882 में काठगोदाम तक रेल लाइन तथा 1891 में जिला मुख्यालय बन जाने के बाद इस झील नगरी का तेजी से विकास हुआ।
2-9 नवम्बर,2000 को यहां उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय की स्थापना हुयी
3-यह 7 पहाडियों से धिरा हुआ है।

यहां के प्रमुख दर्शनीय स्थल इस प्रकार हैं
नैनादेवी मन्दिर-प्राचीन नैना दैवी के मन्दिर का निर्माण श्री मोतीराम शाह जी ने कराया था। जो 1880 के भीषण भू-स्खलन में नष्ट हो गया था।1882 में इसकी पुनः स्थापना हुयी।

नैनापीक-नैनापीक नैनीताल की सबसे ऊची चोटी है

स्नाव्यू-यह बहुत ही खूबसूरत स्थल है। गर्मीयों में यहां सैलानी छुटीयां बिताने आते हैं। यहां रज्जू मार्ग द्वारा भी पहुचा जा सकता है।

नैनीझील-इस झील का नामकरण नैनी मन्दिर के नाम पर पड़ा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शिव देवी सती के मृत शरीर को ले जा रहे थे तो उनकी आंख यहां पर गिरी और इस झील का निर्माण हो गया।

भुवाली-यह स्थल प्राकृतिक सुन्दरता एवं पर्वतीय फल बाजार के लिए प्रसिद्व है।

भीमताल-यह नैनीताल भुवाल मार्ग पर स्थित सोन्दर्यपूर्ण झील है यह झील आकार में नैनीझील से बड़ी है। झील के मध्य में द्वीप है जिस पर एक रेस्टोरेन्ट स्थित है।

कैंची धाम-नैनीताल-अल्मोड़ा मार्ग पर भुवाली से करौली महाराज द्वारा स्थापित यह मन्दिर आज तीर्थाटन का एक महत्वपूर्ण स्थान बन गया है। यहां प्रतीवर्ष 15 जून को विशाल भण्डारे का आयोजन होता है।

कार्बेट राष्ट्रीय उद्यान-1935 में हैली राष्ट्रीय उद्यान के नाम से स्थापित इस उद्यान को वर्तमान नाम 1957 में मिला। इस पार्क का प्रवेश द्वार ढिकाला(नैनीताल) में
है

घोड़ा खाल- यहां पर न्याय का देवता गोलू देवता का मन्दिर है।

काठगोदाम- काठगोदाम बागेश्वर, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़ व सम्पूर्ण कुमाउ का सबसे महत्वपूर्ण रेलवे स्टेशन है। इस कुमाउ का प्रवेश भी कहते हैं।यह स्टेशन 1884 में चालू हुआ था। 1994 में इसे बड़ी रेलवे लाइन बनाया गया।

मुक्तेश्वर- यह नगर बुरांस तथा बांज के वृक्षों से धिरा हुआ है। यहां पर भारतीय पशु चिकित्सा शोध संस्थान तथा मुक्तेश्वर मंदिर भी स्थित है।


                                                                  अल्मोड़ा
अल्मोड़ा नगर कत्यूरि राजाओं द्वारा बसाया गया था। प्राचीन 14वी सदी में यहां पर कत्यूरियों द्वारा
बनाया गया खगमरा किला था। बाद में चन्द राजा भीष्म चन्द्र ने अपनी राजधानी चम्पावत से हटाकर
अल्मोड़ा कर दी। यह नगर चन्द तृतीय के समय मे बनकर पूर्ण हुआ।ं  15 वीं से 16 वीं सदी में इस क्षेत्र का विकास
बहुत तेजी से हुआ।
इस जिले के प्रमुख स्थल निम्न है

1-ब्राइड एंड कार्नर
2-राम शिला मन्दिर
3-नन्दा देवी
4-गणानाथ
5-कटारमल सूर्य मंदिर
6-चितई मंदिर
7-सोमेश्वर
8-शीतलाखेत
9-जालना
10-जागेश्वर मंदिर समूह
11-द्वाराहाट मन्दिर समूह
12-विभाण्डेश्वर
13-दूनागिरी
14-रानीखेत
15-चौबटिया
16-झूला देवी राम मंदिर
17-तारीखेत

ब्राइड एंड कार्नर-यह स्थान सूर्यास्त एवं सूर्योदय के लिए अतिप्रसिद्व है। यहीं पर डियर पार्क भी स्थित है।

नन्दा देवी-यहां प्रतिवर्ष भाद्रपद की अष्टमी को विशाल मेला लगाया जाता है। यह मन्दिर मध्यकालीन
कला उत्कृष्ट कला का उदाहरण है।

गणनाथ-अल्मोडा-ताकुला मार्ग पर स्थित एक गुफा में स्थित एक शिव मन्दिर है। यहां शिवलिंग पर पाकृतिक
रूप से जल टपकता हैै। इसकी चोटी पर मल्लिका देवी का मन्दिर है।

कटारमल सूर्य मन्दिर-यह मन्दिर अपनी काष्ठकला के लिए विश्व प्रसिद्व है। इस मन्दिर का कपाट राष्ट्रीय संग्रहालय
नयी दिल्ली में रखा हुआ है। इस मन्दिर की मुख्य प्रतिमा सूर्य की है। इस मन्दिर को 9वी से 10वी शती में राजा
कटारमल ने बनाया था।

चितई मंदिर-यह मन्दिर न्याय के देवता गोलू देवता का मन्दिर है। यहां आने वाले सभी भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण
होती है।

सोमेश्वर-अल्मोड़ा कौसानी मार्ग पर सोमेश्वर नगर का निर्माण चन्द राजा सोमचन्द ने कराया था

जागेश्वर मंदिर समूह-यह मंदिर छोटे बड़े  कई मंदिरों का समूह है। यह राज्य का सबसे बड़ा मंदिर समूह तथा हिंदुओ
का पवित्र धार्मिक स्थल देवदारों के वृक्षों से घिरा हुआ है। यहां का सबसे प्राचीन मंदिर मृत्युंजय मंदिर व सबसे विशाल
मंदिर दिनदेशवारा है। यहां से कुछ ही दूरी पर प्राचीन वृद्व जागेश्वर मंदिर है। यहां जागनाथ, महामृत्यूंजय,पंचकेदार,डंडेश्वर
कुबेर,लक्ष्मी, व पुष्टि देवी के मंदिर हैं। इस मंदिर समूह का निर्माण कत्यूरी राजा शालिवाहन देव ने कराया था।

द्वाराहाट मंदिर समूह-यह नगर अल्मोड़ा से 170 किमी दूर है। इसे हिमालय की द्वारिका के नाम से भी जाना जाता है।
यह मंदिर का निर्माण कत्यूरी राजाओं के द्वारा किया गया है।

विभाण्डेश्वर-यहां प्रतिवर्ष विषुवत संक्रान्ति के अवसर पर यहां स्याल्दे बिखोति का
प्रसिद्व मेला लगता है।

रानीखेत-यहां पर कुमाउं रेजीमेन्ट का मुख्यालय एवं एक संग्रहालय है। कहा जाता है
कि चन्द राजाओं की रानी जियारानी इधर से जा रही थी। उन्हें यह स्थान अच्छाा लगा
और वह कुछ दिनों तक यहां रूकी। जहां पर वह रूकी थी वहां पर खेत था। बाद में
वह खेत रानीखेत नाम से प्रसिद्व हो गया।

चौबटिया-चौबटिया रानीखेत के समीप ही स्थित है। इसे आर्चड कन्ट्री(फलाद्यान का देश)
ेेके नाम से भी जाना जाता है।


                                                                    पिथौरागढ़

इस जिले की स्थापना 24 फरवरी, 1960 को इस जिले की स्थापना की गई और इसका मुख्यालय पिथौरागढ़ नगर में स्थापित किया गया। इस जिले
के मुख्य पर्यटक स्थल इस प्रकार हैं।

मुनस्यारी - जौहर क्षेत्र का प्रवेश द्धार मुनस्यारी है। गौरी एवं काली नदी का संगम यहीं पर हुआ है।

मिलम ग्लेशियर- पिथौरागढ़ से लगभग 208 किमी दूर मुनस्यारी तहसील में यह ग्लेशियर कुमाउॅ का सबसे
बड़ा ग्लेशियर है। इसके बाद किंगरी बिंगरी
दर्रा पड़ता है।

नारायण आश्रम-यह आश्रम जिला मुख्यालय में धारचूला तहसील में स्थित है।

गंगोलीहाट-यह स्थल महाकाली मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। इसकी स्थापना शंकराचार्य द्धारा शक्ति पीठ के रूप में की गई थी।

हाटकालीका मंदिर-गंगोलीहाट में स्थित हाट-कालिका देवी रणभूमि में गये जावनों की रक्षक मानी जाती है।

पातालभुवनेश्रवर- गंगोलीहाट के पास पाताल भुवनेश्वर मन्दिर एक गुफा के भीतर स्थित है। जिसमें सूर्य,विष्णु, उमा-महेश्वर, आदि
की कई प्राचीन व उत्कृष्ट मूर्तियां हैं

रामेश्वर-पिथौरागढ़ से 35 किमी दूर स्थित रामगंगा और सरयू नदी के संगम पर यह प्रसिद्ध शिव मंदिर है।

अस्कोट-यहां सर्वाधिक कस्तूरी मृगों वाला वन्य जीव बिहार है।

कैलाश मानसरोवर यात्रा-कैलाश मानसरोवर की यात्रा जनपद पिथौरागढ़ से ही होकर जाती है। कुमाउ मंडल
विकास निगम द्धारा संचालित यह यात्रा नई दिल्ली से उ.प्र. से ऊ.सि.न. से धारचूला से तवाधाट से सिरखा
से गलागढ़ से गुंजी से बुल्ली से कालापानी से नाभिढांग से तकलाकोट से कैलाशमानसरोवर पहुचती है।

जयन्ती मंदिर(ध्वज मंदिर)- डीडीहाट मार्ग पर टोटानाला नामक स्थल से कुछ किमी कठिन उचाई चढने पर
एक प्रसि़द्ध मंदिर है।


                                                                 बागेश्वर

बागेश्वर अल्मोढ़ा से 90 किमी की दूरी पर अल्मोढ़ा पिण्डारी मार्ग पर स्थित एक जिला है। जिसे उत्तर का वाराणसी कहा जाता है। इसे प्राचीन काल में व्याघ्रेश्वर भी कहते हैं।सरयू,गोमती और
 अदृश्य भागीरथी के संगम पर बसा यह पवित्र नगर बागनाथ मंदिर के लिए भी विख्यात है।1997 में इसे जिला बनाया गया।

बागेश्वर के प्रमुख दर्शनीय स्थल इस प्रकार है।

बागनाथ मंदिर-
कौसानी-
पिण्डारी ग्लेशियर-
कोट भ्रामरी व नन्दा मन्दिर-
पाण्डुस्थल-

बागनाथ मंदिर - बागेश्वर में मध्य में स्थित व सरयू व गोमती नदी के संगम पर स्थित यह बागनाथ भगवान शिव का बहुत प्रसिद्ध मंदिर है।

कौसानी-गोमती व कौसी नदियों के बीच  पर बसा पिंगनाथ पहाड़ी पर बसा यह अत्यन्त विशिष्ट नगर कौसानी एक पर्यटक स्थल है।
यहां का मुख्य आर्कषण हिमालय दर्शन व सूर्योदय व सूर्यास्त के दृश्य हैं। यहां से चौखम्बा, त्रिशूल, नन्दा देवी, नन्दा कोट, पंच चूली, और
नन्दा घूंघटी की सभी चोटियां स्पष्ट दिखाई देती हैं। 1929 में महात्मा गॉधी यहॉ पर 12 दिन तक रहे तथा अपने लेख ‘यंग इंडिया’ में उन्होंने
कौसानी को ‘भारत का स्वीटजरलैंड’ कहा था। गांधी जी यहीं अनाशक्ति आश्रम में गीता का अनाशक्ति योग लिखा था। यहीं पर गांधीजी की शिष्या
सरला बहन का लक्ष्मी आश्रम भी है। यह महान प्रकृति प्रेमी सुमित्रानन्दर पन्त की जन्म स्थली है।
कौसानी के निकट ही पिनाकेश्वर महादेव , बूरा पिननाथ एवं भटकोट आदि प्रसिद्ध स्थल भी हैं।
         

बैजनाथ- यह बागेश्वर से 25 किमी की दूरी पर मंदिरो का एक समूह है। बैजनाथ के मुख्य मंदिर में आदम के आकार की पार्वती की मूर्ति स्थापित है
बैजनाथ का मंदिर कत्यूरी शासकों द्धारा बनाया गया।

पिण्डारी ग्लेशियर- यह ग्लेशियर बहुत आर्कषक तथा पिण्डारी नदी का उदगम स्थल है। यहां ब्हमकमल, मोनाल, व बुरांस आदि के वृक्ष देखे जा सकते
हैं।

कोट भ्रामरी का मंदिर-बैजनाथ से कुछ दूरी पर डंगोली के पास भ्रामरी का मंदिर स्थापित है।

पाण्डुस्थल-कुमाउ व गणवाल की सीमा पर यह पाण्डवों के अज्ञातवास के कारण प्रसिद्व स्थल है। यहां कृष्ण जन्माष्टमी का प्रसिद्ध मेला लगता है।


                                                                   चम्पावत

15 सितम्बर, 1997 को इसे जनपद का रूप दिया गया था। चम्पावत 953 ई. से 1563 ई. तक चन्द्रवंशीय राजाओं की
राजधानी रही थी।
चम्पावत का प्राचीन नाम कुमुं है। काली नदी होने केे कारण इसें कुमुं काली भी कहते हैं।
 इसका मूल नाम चम्पावती है।
चम्पावत के प्रमुख दर्शनीय स्थल अधोलिखीत हैं।

बालेश्वर मन्दिर -  यह मन्दिर शिल्पकला की दृष्टि से जिले का सर्वोत्कृष्ट मंदिर है।
इस मंदिर का निर्माण चन्द्र वंशीय राजाओं ने कराया था।

क्रान्तेश्वर महादेव - चम्पावत नगर में क्रान्तेश्वर महादेव का मन्दिर उंचे पर्वत शिखर पर स्थित है।
इसे कुर्मापद या कानदेव के नाम से भी जाना जाता है।

नौ ढुंग्गाधर(नौ पत्थर का मकान) - यह चम्पावत - पिथौरागढ मार्ग पर पड़ता है। इस मकान के किसी भी कोने से गिनने
पर 9 ही पत्थर मिलतें हैं।

एक हथिया नौला-जब चन्द राजाओं ने श्री जगन्नाथ मिस्त्री से बालेश्वर मन्दिर बनवाया था तो राजा ने ऐसी कला का अन्यत्र प्रचार-प्रसार
न हो सके इस हेतु मिस्त्री का दहिना हाथ कटवा दिया । तब मिस्त्री ने अपनी लड़की कुमारी कस्तूरी की मदद से बालेश्वर मन्दिर से भी ज्यादा
भव्य कलात्मक इस ऐतिहासिक नौला(बाबला) का निर्माण कर चन्द्र राजाओं के घमण्ड को तोड़ा। यह कलात्मक दृष्टि से एक अद्भुत नमूना है।

बाणासुर का किया - यह स्थान चम्पावत मुख्यालय से मात्र  16 किमी तथा लोहाघाट से 4 किमी की दूरी पर एक शिखर पर है। बाणासुर को शिव
का अनन्य भक्त माना जाता है।

मायावती आश्रम-यहां पर स्वामी विवेकानन्द को आध्यात्मिक शान्ति प्राप्ति हुयी थी। तब उन्होंने यहां पर 1901 में रामकृष्ण शान्ति मठ नाम की स्थापना की थी।
इससे पूर्व यहां पर अद्धेत आश्रम था।

ग्वाल देवता - लोहाघाट के पास स्थित इस मंदिर के देवता को गोरिल या न्याय के अधिष्ठाता देवता या गालू देवता के रूप में जाना जाता है।

देवीधुरा - रक्षाबन्धन के अवसर पर यहां आसाड़ कौतिक मनाया जाता है। जिसे बग्वाल मेल के नाम से भी जाना जाता है। इस खेल के बारे में कार्बेट ने अपनी पुस्तक
‘मैन ईटर ऑफ कुमाउ’ में भी लिखा है।

पंचेश्वर - यह स्थल चौमुॅह के मन्दिर के लिए प्रसिद्ध है। चौमुॅह को पशुरक्षक के रूप में पूजा जाता है। मन्दिर भगवान श्वि को समर्पित है।

श्यामताल - इस झील के तट पर स्वामी विवेकानन्द आश्रम स्थित है।नीले रंग की श्यामताल झील 1.5 किमी में फैली हुयी है।

मीठा-रीठा साहिब- लोधिया एवं राटिया नदियों के संगम पर स्थित इस स्थल पर 1960 में गुरूद्धारे का निर्माण कराया गया था। गुरूद्धारे के प्रागण में मीठे रीठे के वृक्ष हैं। कहा जाता है कि गरूनानक देव ने इस
स्थान की यात्रा की थी और यहां के गोरखपंथी  जोगियों के साथ आध्यात्मिक विचार विमर्श किया था।

पुर्णागिरी मन्दिर - पूर्णागिरी मन्दिर शक्तिपीठ टनकपुर से कुछ दूरी पर स्थित है।चैत्र नवरात्र में यहां मेला लगता है। देश में 108 शक्तिपीठ में यह भी एक शक्तिपीठ है। यहां सती जी का नाभि अंग गिरा था।

पाताल रूद्रेश्वर गुफा - पवित्र गुफा पाताल रूद्रेश्वर की खोज सन्1993 में 14 वर्षीय बालक के स्वप्न मे मंा दुर्गा के दर्शन एवं उसे गुफा के बारे में बताने के बाद हुई।
यह गुफा चम्पावत के बारसी गांव में स्थित है।


                                                 ऊधमसिंह नगर

पहले यह जिला नैनीताल जिले में था 1995 में इसे जिला बनाया गया। यह जिला
तीन उपभागों (रूद्रपुर,काशीपुर, व खटीमा) से मिलकर बना है। यहां थारू
एवं बोक्सा जनजाति के लोग भी रहते हैं। इसका अधिकांश भाग समतल है देश के
अन्य भागों से यह रेल एवं सड़क मार्गों से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है।

इस जिले के प्रमुख दर्शनीय स्थल निम्न प्रकार हैं।

रूद्रपुर - ऊधमसिंह नगर जिले का मुख्यालय रूद्रपुर राज्य के तराई क्षेत्र का एक प्रमुख
औद्योगिक नगर है। यहां कृषि विकसित अवस्था में है।

नानकमत्ता साहिब-यह सिक्खों का एक पवित्र स्थल है। इसके पास ही
विशाल नानक सागर बांध भी है।

अटरिया देवी मन्दिर-यहां नवरात्र में भारी भीड़ रहती है।

काशीपुर- गुमानी पन्त जी की जन्मस्थली काशीपुर ही है। हर्षकाल में चीनी यात्री
युआन चांग ने इस नगर को देखा था। उस समय इसे गोविषाण कहते थे।

चैती देवी मन्दिर- काशीपुर-बाजपुर मार्ग पर काशीपुर बस स्टेशन से 2.5 किमी की दूरी
पर है।

गिरी सरोवर- काशीपुर-रामनगर मार्ग पर काशीपुर स्टेशन से 2 किमी की दुरी पर एक
मनोहर झील है।

पंत नगर - 17 नवम्बर 1960 को नेहरू ने यहां पर 16 हजार एकड़ क्षेत्र में पहले कृषि
विश्वविधालय की स्थापना की थी

UTTARAKHAND CENSUS 2001


uttarakhand census 2001



उत्तराखण्ड जनगणना -2011

  कुल जनसंख्या

उत्तराखण्ड की जनसंख्या देश की कुल जनसंख्या का 0.84 प्रतिशत है।
क्षेत्रफल की दृष्टि से उत्तराखण्ड देश के कुल क्षेत्रफल का 1.69 प्रतिशत है।
साक्षरता की दृष्टि से उत्तराखण्ड 17 वें स्थान पर है।
जबकि जनसंख्या की दृष्टि से भारत के राज्यों में इसका 20 वॉं स्थान है।
दशकीय जनसंख्या वृद्धि (19.17 प्रतिशत) की दृष्टि से देश में 16 वां स्थान है। राष्ट्रीय औसत-17.64 प्रतिशत

सर्वाधिक जनसंख्या वाला जिला  - हरिद्धार
सबसे कम जनसंख्श वाला जिला - रूद्रप्रयाग
10 लाख से अधिक जनसंख्या वाले राज्य में केवल तीन जिलें - हरिद्धार, देहरादून , उद्यमसिंह नगर
0-6 आयु वर्ग के कुल शिशुओं का लिंगानुपात - 908 है।
राज्य में सर्वाधिक दशकीय वृद्वि दर (27.45) 1971 से 1981 के दौरान था।
अल्मोडा(-1.73 प्रतिशत ) व पौढ़ी गढ़वाल(-1.51प्रतिशत ) शून्य से नीचे रही है
सर्वाधिक दशकीय जनसंख्या वृद्वि दर में गिरावट टिहरी गड़वाल में दर्ज की गई है। हरिद्वार 33.16 प्रतिशत व देहरादून 32.48 प्रतिशतें दशकीय जनसंख्या वृद्वि
दर में वृद्वि हुयी है।


 जनघनत्व -

उत्तराखण्ड का जनघनत्व - 189 वर्ष 2001 में 159
सर्वाधिक जनघनत्व वाला जिला -हरिद्धार
सबसे कम जनघनत्व वाला जिला -उत्तरकाशी

 लिंगानुपात-

लिंगानुपात की दृष्टि से देश में उत्तराखण्ड 13वें स्थान पर है।
 2001 में लिंगानुपात-962
2011 में लिंगानुपात-963
लिंगानुपात का राष्ट्रीय औसत-940

 साक्षरता-

2011 में उत्तराखण्ड की साक्षरता दर- 79.63 प्रतिशत
साक्षरता दर का राष्ट्रीय औसत-74.04 प्रतिशत

                                          उत्तराखण्ड अनुसूचित जाति एवं जनजातियां
राज्य के सर्वाधिक और सबसे कम अनूसूचित जाति वाले जिले क्रमशः हरिद्वार और चम्पावत हैं।
राज्य के सर्वाधिक और सबसे कम अनूसुचित जाति प्रतिशत वाले जिले क्रमशः बागेश्वर एवं उधमसिंह नगर हैं।
राज्य के सर्वाधिक और सबसे कम अनुसूचित जाति वाले जिलं क्रमशः ऊधमसिंह नगर एवं रूद्रप्रयाग है।
राज्य में अनूसूचित जनजातियों के सर्वाधिक और सबसे कम प्रतिशत वाले जिले क्रमशः ऊधमसिंह नगर एवं रूद्रप्रयाग हैं।
राज्य में सर्वाधिक और सबसे कम अनूसुचिज जनजातियां जौनसारी एवं राजी हैं।
अनुसूचित जनजातियों के लिए 2 सीटें अनूसूचित जनजातियां के लिए आरक्षित है।
उत्तराखण्ड सरकार ने जुलाई 2001 में एक शासनादेश द्वारा राजकीय सेवाओं,शिक्षण संस्थाओं, सार्वजनिक उद्यमों ,निगमों एवं
स्वायन्तशासी संस्थाओं में अनुसूचित जनजातियों के लिए 4 प्रतिशत के आरक्षण की व्यवस्थाओं की व्यवस्था की है।
राज्य की कुल जनसंख्या में 17.87 प्रतिशत है।
राज्य की कुल जनसंख्या में 3.02 प्रतिशत है।
राज्य की कुल 5 अनुसूचित जनजातियां घोषित की गई हैं।
राज्य में सर्वाधिक और सबसे कम अनूसुचिज जनजातियां जौनसारी एवं राजी हैं।

प्रमुख अनु. जनजातियां

                        जौनसारी
जौनसारी राज्य का सबसे बड़ा जनजातिय समुदाय होने के साथ गढ़वाल का भी सबसे बड़ा समुदाय हैं।
इस क्षेत्र के अन्तर्गत देहरादून का बाबर क्षेत्र (चकराता, कालसी, त्यूनी), लाखामंडल, आदि क्षेत्र ,टिहरी का जौनपुर
एवं उत्तरकाशी का परग नेकाना क्षेत्र आता है। हनोल इनका प्रमुख तीर्थ स्थल है।

                         थारू
ऊधमसिंह नगर जिले में मुख्य रूप से खटीमा, किच्छाा,नानकमत्ता, और सितारगंज के 144 गांवों
में निवास करने वाले थारू उत्तराखण्ड के दूसरे सबसे बड़े समुदाय हैं। सामन्यतः थारूओं को
को किरात वंश का माना जाता है। थार का शाब्दिक अर्थ मदिरा है। और थारू का अर्थ मदिरापान
करने वाला है।
                     
                        भोटिया
भोटिया एक अर्धघूमंतू जनजाति है यह मध्य हिमालय की सर्वाधिक जनसंख्या वाली जनजाति है
राज्य के तिब्बत से सटे सीमावर्ती भाग को भोट प्रदेश कहा जाता है। लदाख में इन्हें भोटा किन्नोर
में इन्हें भोट तथा भूटान ने भूटानी कहा जाता है। भोटिया स्वयं को खस या राजपूत मानते हैं

                             बोक्सा

बोक्सा मुख्यतः उत्तराखण्ड के तराई बावर क्षेत्र में उघमसिंह नगर के बाजपुर,गदरपुर, एवं काशीपुर , नैनीताल के रामनगर
पौढी गढ़वाल के दुगडा एवं देहरादून के विकासनगर एवं सहसपुर विकासखण्ड के लगभग 173 ग्रामों में पाए जाते हैं।

                         राजी

राजी मुख्यतः पिथौरागड़ जनपद के धारचूला, कनालीछीना, एवं डीडीहाट खण्डों के 7 गांवों के अलावा चम्पावत के एक गांव
में निवास करते हैं।

UTTARAKHAND A SMALLEST REVIEW


उत्तराखण्डःएक संक्षिप्त अवलोकन

राज्य गठन-            9 नवम्बर,2000
भारतीय गणतंत्र का उत्तराखण्डः         27वां राज्य
हिमालयी राज्यों के क्रम में उत्तराखण्डः          11 वा राज्य
राज्य का नाम                    :       31-12-2006 तक उत्तरांचल 1-1-2007 से उत्राखण्ड
राजधानी                                देहरादून
राजकीय भाषा                            हिन्दी(जनवरी 2010 से दूसरी भाषा संस्कृत)
राजकीय चिन्ह- एक गोलाकार मुद्रा में तीन पर्वत चोटियां और उसके नीचे गंगा की चार लहरें अंकित है। बीच की चोटी में अशोक का लाट अंकित है।
राजकीय पशु-  कस्तूरी मृग(हिमालयन मस्क डियर)
राजकीय वृक्ष-   बुरांस
राजकीय पुष्प-    ब्रहम कमल
 विघानमंडल-    एकसदनात्मक
विधानसभा का प्रथम गठन(अंतरिम)-  9 नवं, 2000 को (30 सदस्यीय )
प्रथम विधानसभा का प्रथम सत्र-9 जनवरी 2001 से
विधानसभा का अपना बेवसाइट शुरू-4 मई 2001 से(देश में प्रथम)
राज्य गठन से पूर्व इस क्षेत्र की कुल विधानसभा सीटें थी-22
परिसीमन के बाद विधानसभा की कुल सीटेें-71(70 निर्वाचित 1 मनोनीत)
विधानसभा की कुल सुरक्षित सीटें-15(13 अनुसूचित जनजाति व 2 अनूसूचित जनजाति)
उच्च न्यायालय की स्थापना- 9 नवं, 2000 को(देश का 20वां, नैनीताल)
कुल नगर निगम -3(देहरादून, हरिद्वार, व हल्द्वानी)
कैण्टोमेंट बोर्ड- 9(सेन्य कस्बों में)
नोटिफाइड एरिया-1(सेन्य कस्बों में)

सर्वाधिक तहसीलों वाले जिलें-अल्मोड़ा एवं पौढ़ी(9-9 तहसीलें)
सबसे कम तहसीलों वाले जिलें-हरिद्वार व रूद्रप्रयाग(3-3 तहसीलें)
सर्वाधिक विधानसभा सीटेें- हरिद्वार में (11)
सबसे कम विधानसभा सीटें- बागेश्रवर , रूद्रप्रयाग, चम्वावत में(2-2 विधानसभा सीटें)
सर्वाधिक विकासखण्डों वाला जिला-पौढ़ी(15 ब्लाक)
सबसे कम विकासखण्डों वाला जिला-रूद्रप्रयाग व बागेश्रवर(3-3 ब्लाक)